बाबा बुल्ले शाह की मजार में तोड़फोड़, सतना प्रलेस ने जताया कड़ा विरोध

सतना (मध्य प्रदेश)। 18वीं सदी के महान सूफ़ी संत एवं दार्शनिक बाबा बुल्ले शाह की मजार में हुई तोड़फोड़ पर, सतना प्रगतिशील लेख़क संघ (प्रलेस) ने गहरा रोष व्यक्त किया है।

अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ ने उत्तराखण्ड के मसूरी में हुई इस निंदनीय घटना को न केवल सांस्कृतिक विरासत पर हमला बताया है, बल्कि इसे सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की साजिश करार दिया है।

सतना इकाई के अध्यक्ष संतोष खरे और महासचिव विजयशंकर चतुर्वेदी ने एक संयुक्त बयान में कहा है कि बाबा बुल्ले शाह जैसे सूफ़ी संतों की दरगाहें सदियों से प्रेम, भाईचारे और मानवीय मूल्यों का संदेश देती रही हैं। बाबा बुल्ले शाह का निधन 1757 में हुआ था और उनकी दरगाह आज पाकिस्तान के कसूर में स्थित है, जबकि मसूरी स्थित उनकी यह मजार ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

यह घटना देश के शांतिपूर्ण माहौल को नुकसान पहुंचाने और सांप्रदायिक उन्माद फैलाने की नापाक कोशिश है। भारत की सांस्कृतिक विरासत और साझा परंपराओं पर बढ़‌ रहे हमलों को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

वरिष्ठ कवि-पत्रकार विजयशंकर चतुर्वेदी ने बताया कि मसूरी स्थित बाबा बुल्ले शाह की मजार में शनिवार को तोड़फोड़ की गई। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, तोड़फोड़ करने वालों ने हथौड़ों और लोहे की छड़ों का इस्तेमाल किया। इस मामले में तीन लोगों—हरिओम, शिवम और श्रद्धा—की पहचान आरोपियों के रूप में की गई है, जबकि अन्य अनेक व्यक्तियों पर भी आरोप दर्ज किए गए हैं।

पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की उन धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है, जो धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाने, सार्वजनिक शांति भंग करने और धर्म का अपमान करने से संबंधित हैं।

लेखक संगठन ने उत्तराखंड सरकार और मसूरी प्रशासन से मांग की है कि दोषियों को तत्काल गिरफ्तार कर उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए, तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

(जनचौक ब्यूरो)

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